दो ध्रुवीयता का अंत (CHAPTER 2). POLITICAL SCIENCE 12TH

 POLITICAL SCIENCE 12TH

  दो ध्रुवीयता का अंत (CHAPTER 2)

    बर्लिन की दीवार

- दुसरे विश्व युद्ध के बाद तथा शीत युद्ध के दौरान विश्व दो भागों में बट चुका था ।बर्लिन की दीवार का बनाना शीतयुद्ध का सबसे बड़ा प्रतीक  था
- बर्लिन की दीवार का निर्माण सन 1961 मे हुआ ।
- बर्लिन की दीवार की लम्बाई 150 किलोमीटर थी ।
- बर्लिन की दीवार को 9 नवंबरब 1989 को जनता के द्वारा तोड़ दिया गया ।इसके बाद जर्मनी का एकीकरण हो गया 
- 25 दिसम्बर 1991 को सोवियत संघ का विघटन हो गया । सोवियत संघ के पतन के साथ साथ ही दो ध्रुवीयता का अंत हो गया । क्योंकि सोवियत संघ अलग अलग राज्यो मे बट चुका था ।
- ऐसे मे एक मात्र महाशक्ति अमेरीका ही रह गया ।

  सोवियत संघ का जन्म, व्यवस्था ( प्रणाली ) 

   
- 1917 की रूसी बोल्शेविक क्रांति के बाद समाजवादी सोवियत गणराज्य संघ ( U . S . S . R . ) अस्तित्व में आया । 

                                                      

                               सोवियत  प्रणाली



- सोवियत प्रणाली पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध तथा समाजवाद के आदर्शों से प्रेरित थी
- सोवियत प्रणाली में नियोजित अर्थव्यवस्था थी ।
- कम्यूनिस्ट पार्टी का दबदबा था ।
- न्यूनतम जीवन स्तर की सुविधा
- बेरोजगारी न होना।
- उन्नत संचार प्रणाली ।
- मिल्कियत का प्रमुख रूप राज्य का स्वामित्व ।
- उत्पादन के साधनों पर राज्य का नियंत्रण था ।
- सब कुछ था परंतु नागरिको को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नही थी ।
- 1970 के अन्तिम वषों तक आते आते पूर्ण सोवियत व्यवस्था लड़खड़ाने लगी । खाधान्न का आयात बढा U.S.S.R. अपने देश की आर्थिक व राजनीतिक मांग पेश न कर सका ।

      दुसरी दुनिया

- पूर्वी यूरोप के देशों को समाजवादी प्रणाली की तर्ज पर ढाला गया था, इन्हें ही समाजवादी खेमे के देश या दूसरी दुनिया कहा गया ।

    मिखाइल गोर्बाचेव व विघटन


- सोवियत रूस के आखिरी जनरल सेक्रेटरी मिखाइल गोर्बाचेव का जन्मज2 मार्च 1931 को हुआ था ।
- 1980 के दशक के मध्य सोवियत संघ की साम्यवादी पार्टी के अध्यक्ष बने ।
-मिखाइल गोर्बाचेव ने राजनीतिक सुधारों तथा लोकतांत्रीकरण को अपनाया उन्होंने पुर्नरचना ( पेरेस्त्रोइका ) व खुलापन ( ग्लासनोस्त ) के नाम से आर्थिक सुधार लागू किए । 
- 1991 में बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के देशों ने तथा रूस ,यूक्रेन, बेलारूस ने सोवियत संघ की समाप्ति की घोषणा की गोर्बाचेव की नीतियों का कम्यूनिस्ट पार्टी ने विरोध किया।
- स्वतन्त्र राज्यों का राष्ट्रकुल बनाया  विश्व पटल पर 15 नए गणराज्य उभरे ।
- रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी माना गया। उसे ही सुरक्षा परिषद्



   मिखाइल गोर्बाचेव की नीतियां


 1985 में शासन अर्थव्यवस्था को सुधारने हेतु तीन नीतियां अपनाई :--
- अर्थव्यवस्था की वृद्धि को गुणात्मकता की ओर ले जाना अर्थात उस्कोरनी ( त्वरण )।
- राजनीतिक, आर्थिक, और प्रशासनिक सुधार अर्थात परिस्त्रोमका ( पुनर्गठन )।
- सार्वजनिक विषयों के बारे मे खुलकर विचार करने का नागरिको को अधिकार अर्थात ग्लासनोस्त ( खुलापन )।

    सोवियत संघ के विघटन के कारण


- नागरिकों की राजनीतिक और आर्थिक आंकाक्षाओं को पूरा न कर पाना ।
- सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा ।
- कम्यूनिस्ट पार्टी का अंकुश ।
- संसाधनों का अधिकांश भाग पूर्वी यूरोप के देशों व परमाणु हथियारों और सैन्य सामान  पर खर्च करना ।
- प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे में पश्चिम के मुकाबले पीछे रहना ।
- रूस की प्रमुखता ।
- गोर्बाचेव द्वारा किए गए सुधारों का विरोध होना ।
- अर्थव्यवस्था गतिरूद्ध व उपभोक्ता वस्तुओं की कमी ।
- राष्ट्रवादी भावनाओं और सम्प्रभुता की इच्छा का उभार ।

     सोवियत संघ के विघटन के परिणाम

- शीतयुद्ध से उत्पन्न संघर्ष की समाप्ति ( दुसरी दुनिया )
- एक ध्रुवीय विश्व अर्थात अमरीकी वर्चस्व का उदय ।
- हथियारों की होड़ की समाप्ति ।
- सोवियत खेमे का अंत और 15 नए देशों का उदय ।
- रूस सोवियत संघ का उत्तराधिकारी बना ।
- विश्व राजनीति में शक्ति संबंधों में परिवर्तन ।
- समाजवादी विचारधारा पर प्रश्नचिन्ह या पूँजीवादी उदारवादी व्यवस्था का वर्चस्व ।

 शाॅक थेरेपी ( SHOCK THERAPY )


- आघात पहुँचाकर उपचार करना ।साम्यवाद के पतन के बाद सोवियत संघ के गणराज्यों को विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा निर्देशित साम्यवाद से पूंजीवाद की ओर संक्रमण ( परिवर्तन ) के मॉडल को अपनाने को कहा गया । इसे ही शॉक थेरेपी कहते है ।

शाॅक थेरेपी की विशेषताएं


- राज्य की संपदा का निजीकरण ।
- सामुहिक फार्म की जगह निजी फार्म ।
- मुक्त व्यापार व्यवस्था को अपनाना ।
- मुद्राओं की आपसी परिवर्तनीयता ।
- पश्चिमी देशों की आर्थिक व्यवस्था से जुड़ाव ।
- पूंजीवाद के अतिरिक्त किसी भी वैकल्पिक व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया गया ।

 शाॅक थेरेपी के परिणाम

-आर्थिक परिणाम

- रूस का औद्योगिक ढांचा चरमरा गया । अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई ।
- सफल घरेलु उत्पाद घटा ।
- रूसी मुद्रा रूबल में गिरावट आई ।
- समाज कल्याण की पुरानी व्यवस्था नष्ट ।
- 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों या कम्पनियों को कम दामों ( औने - पौने ) दामों में बेचा गया जिसे इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल कहा जाता है ।
- आर्थिक विषमता बढ़ी ।
- खाद्यान्न संकट हो गया ।
- माफिया वर्ग का उदय ।
- कमजोर संसद व राष्ट्रपति को अधिक शक्तियाँ जिससे सत्तावादी राष्ट्रपति शासन

- सामाजिक परिणाम 

-काम का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा,समाज कल्याण की पुरानी व्यवस्था नष्ट

- राजनीतिक परिणाम

- कमजोर संसद व राष्ट्रपति को अधिक शक्तियाँ जिससे सत्तावादी राष्ट्रपति शासन ।
- राष्ट्रपति नेल्सन की लोकप्रियता समाप्त, उनके द्वारा 1993 में संसद भंग करने की धमकी, 1994 में चेचन्या में हिंसक अलगाववादी आन्दोलन 1995 में रूसी संसद के लिए चुनाव है ।

 संघर्ष व तनाव के क्षेत्र


पूर्व सोवियत संघ के अधिकांश गणराज्य संघर्ष की आशंका वाले क्षेत्र है।इन देशों में बाहरी ताकतों की दखलंदाजी भी बढ़ी है। रूस के दो गणराज्यों चेचन्या और दागिस्तान में हिंसक अलगाववादी आन्दोलन चले । चेकोस्लोवाकिया दो भागों - चेक तथा स्लोवाकिया में बंट गया ।

-बाल्कन क्षेत्र

बाल्कन गणराज्य यूगोस्लाविया गृहयुद्ध के कारण कई प्रान्तों में बँट गया । जिसमें शामिल बोस्निया - हर्जेगोविना, स्लोवेनिया तथा क्रोएशिया ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया ।

- बाल्टिक क्षेत्र

बाल्टिक क्षेत्र के लिथुआनिया ने मार्च 1990 में अपने आप को स्वतन्त्र घोषित किया । एस्टोनिया, लताविया और लिथुआनिया 1991 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बने । 2004 में नाटो में शामिल हुए ।

- मध्य एशिया

- मध्य एशिया के ताजिकिस्तान में 10 वर्षों तक यानी 2001 तक गृहयुद्ध चला । अज़रबैजान, अर्मेनिया, यूक्रेन, किरगिझस्तान, जार्जिया में भी गृहयुद्ध की स्थिति हैं ।
- मध्य एशियाई गणराज्यों में पेट्रोल का विशाल भंडार है । इसी कारण से यह क्षेत्र बाहरी ताकतों और तेल कंपनियों की प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन गया है ।

- पूर्व साम्यवादी देश और भारत


- पूर्व साम्यवादी देशों के साथ भारत के संबंध अच्छे है, रूस के साथ विशेष रूप से प्रगाढ़ है ।
- दोनो का सपना बहुध्रवीय विश्व का है
- दोनो देश सहअस्तित्व, सामूहिक सुरक्षा, क्षेत्रीय सम्प्रभुता, स्वतन्त्र विदेश नीति, अर्न्तराष्ट्रीय झगड़ों का वार्ता द्वारा हल, संयुक्त राष्ट्रसंघ के सुदृढ़ीकरण तथा लोकतंत्र में विश्वास रखते है ।
- 2001 में भारत और रूस द्वारा 80 द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर 
- भारत रूसी हथियारों का खरीददार ।
- रूस से तेल का आयात ।
- परमाण्विक योजना तथा अंतरिक्ष योजना में रूसी मदद ।
- कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ उर्जा आयात बढ़ाने की कोशिश ।
- गोवा में दिसम्बर 2016  में हुए ब्रिक्स ( BRICS ) सम्मलेन के दौरान रूस - भारत के बीच हुए 17 वें वार्षिक सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी एवं रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतीन के बीच रक्षा, परमाणु उर्जा, अंतरिक्ष अभियान समेत आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देने एवं उनके लक्ष्यों की प्राप्ति पर बल दिया गया ।

THANKS NCERT BOOK AND GOOGLE.  NCERT BOOK के अध्यन और GOOGLE की सहायता से यह ब्लॉग बनाया है।



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